कॉर्क जैसी छाल वाला ऊँचा, सुडौल वृक्ष, जो रात होते-होते रुपहले-श्वेत नलिकाकार पुष्पों के पूरे पुष्पगुच्छ खिला देता है और संध्या की वायु को गाढ़ी मीठी सुगन्ध से भर देता है — इसी सुगन्ध के कारण इसे चमेली कहा जाने लगा। पर आकाश मल्ली सच्ची चमेली नहीं: यह चमेलियों के वंश का नहीं, केवल देखने में वैसा है। व्रज में इसकी अपनी कोई लीला नहीं, फिर भी व्रज की आठ «चमेलियों» में इसका स्थान है — उन पौधों में, जो वंश से नहीं, बल्कि अपने श्वेत सुगन्धित पुष्पों के कारण चमेली कहलाते हैं।

«आकाश मल्ली» का अर्थ है «आकाश-चमेली»: मल्ली अर्थात् चमेली, आकाश अर्थात् गगन; यह नाम इसे चमेली-जैसे श्वेत सुगन्धित पुष्पों के कारण मिला। हिन्दी में इसे नीम चमेली कहते हैं — «नीम के पत्तों वाली चमेली»: इसकी महीन पिच्छाकार पत्तियाँ नीम-सी लगती हैं और पुष्प चमेली-सा (चमेली)। परन्तु इस सुन्दर नाम के पीछे चमेली नहीं है। वानस्पतिक दृष्टि से आकाश मल्ली बिग्नोनिएसी कुल का वृक्ष है, जैकरंडा का सम्बन्धी, और Jasminum वंश की सच्ची चमेलियों से इसकी समानता केवल बाहरी रूप की है।
व्रज के कवियों और आचार्यों ने अनेक पुष्पों की महिमा गायी है: मल्लिका, कुन्द, जाती, मालती। इन्हीं पुष्पों से गोपियाँ कृष्ण के लिए मालाएँ गूँथती हैं, और विरह में इन्हीं से पूछती हैं कि क्या वे पास से होकर तो नहीं निकले। ये सारे श्लोक सच्ची चमेलियों के, अर्थात् अन्य पौधों के विषय में हैं। आकाश मल्ली इस पंक्ति में नहीं आता: न इसकी कोई लीला है, न कोई श्लोक, और भारत में तो यह अतिथि ही है — जंगली रूप में यह वृक्ष निचला बर्मा से हिन्दचीन (इंडोचाइना) तक मिलता है, जबकि भारत में इसे उद्यानों और सड़कों के किनारे रोपा जाता है। रात में खिलकर व्रज को सुगन्ध से भर देने वाले श्वेत सुगन्धित पुष्पों के बीच «आकाश-चमेली» का स्थान शान्त और दूर का है।
न चरक, न सुश्रुत, न ही निघण्टु-कोश आकाश मल्ली को जानते हैं: यह दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया की लोक-चिकित्सा का ही वृक्ष बना रहा। इसकी पत्तियाँ और फूल फेफड़ों के रोगों — ब्रोंकाइटिस (श्वसनी-शोथ) और दमा (अस्थमा) — में काम आते हैं; साइनसाइटिस और श्वास-कष्ट में राहत के लिए तो इन्हें सुखाकर धूम्रपान तक किया जाता है। छाल ज्वरहर और मूत्रल मानी जाती है। पत्तियों में हिस्पिडुलिन नामक शोथहर (प्रति-शोथ) पदार्थ मिला है — इस वृक्ष की कफ-निस्सारक और रोगाणुरोधी ख्याति इसी से जोड़ी जाती है।
आकाश मल्ली — Millingtonia hortensis — अपने वंश की एकमात्र जाति है। वृक्ष ऊँचा होता है, अठारह से पच्चीस मीटर तक, सुडौल और तेज़ी से बढ़ने वाला, किन्तु इसकी लकड़ी भंगुर होती है और हवा से डालियाँ प्रायः टूट जाती हैं। छाल राख के रंग की, दरारों भरी, कॉर्क जैसी होती है — इसी छाल के कारण इसे «कॉर्क वृक्ष» कहा जाने लगा। यह वर्ष में दो बार फूलता है: अप्रैल से वर्षा-ऋतु तक और फिर नवम्बर-दिसम्बर में। फल चपटे सम्पुट (कैप्सूल) होते हैं, जिनके पंखयुक्त बीजों को पक्षी दूर-दूर तक फैला देते हैं।
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